the death of the father of socialism

समाजवाद के पुरोधा का जाना

Editorial

the death of the father of socialism

Mulayam Singh Yadav : भारत में समाजवाद की राजनीति के एक और पुरोधा अब नहीं रहे। उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता। वे अपने अंतिम समय तक उस परंपरा का निर्वाह करते रहे जोकि ठेठ देहाती और भारतीयपन लिए हुए है। समाजवादी पार्टी के संस्थापक रहे मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के निधन के साथ ही उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति में एक युग का अवसान हो गया है। राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण से लेकर चौधरी चरण सिंह तक के साथ काम करने वाले मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) ने यूपी की सियासी जमीन को समाजवाद के लिए उपजाऊ बनाया था। जवानी के दिनों में अखाड़े में पहलवानी करने वाले मुलायम सिंह यादव सियासत में भी अपने चरखा दांव के लिए विख्यात थे। तीन बार यूपी के मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के सियासी जीवन में उतार-चढ़ाव जरूर आए, लेकिन वे अपने समर्थकों के लिए हमेशा नेताजी बने रहे। उनके निधन से राजनीति में ऐसा शून्य पैदा हुआ है, जिसे भर पाना असंभव होगा। वे उस पांत के नेता थे, जोकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों के लिए जानी जाती है। हालांकि मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के साथ तमाम विवाद जुड़े रहे।

अपने नाम के अनुरूप मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) हमेशा अपने समर्थकों और विरोधियों के प्रति भी मुलायम बने रहे। यही वजह है कि कट्टर प्रतिद्वंद्वी कहे जाने वाली भाजपा हो या फिर बसपा, सभी के नेताओं से मुलायम सिंह यादव के अच्छे रिश्ते बने रहे। खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके गहरे दोस्ताना संबंध थे। वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले संसद के आखिरी सत्र में उन्होंने नरेंद्र मोदी को आशीर्वाद दिया था कि वे एक बार फिर से पीएम बनेंगे। 22 नवंबर, 1939 को सैफई में जन्मे मुलायम सिंह यादव करीब 5 दशकों तक यूपी के शीर्ष नेताओं में से एक बने रहे। मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) 10 बार विधायक चुने गए और 7 बार सांसद भी रहे। वे 1996 से 1998 के दौरान देश के रक्षा मंत्री रहे थे और तीन बार यूपी के मुख्यमंत्री भी बने। मुलायम सिंह यादव ने 1989-91, 1993-95 और 2003-07 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर काम किया था। यही नहीं एक दौर में तो वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी बने थे। दशकों तक वे राष्ट्रीय नेता रहे, लेकिन उनकी सियासत का मुख्य उखाड़ा उत्तर प्रदेश ही था। किशोरावस्था से ही राम मनोहर लोहिया से प्रभावित थे। भले ही 2017 में वे सपा में बैकसीट पर गए और अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन मुलायम सिंह यादव ही सपा कार्यकर्ताओं के लिए नेताजी बने रहे।

मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) को राजनीति में हमेशा संभावनाएं बनाए रखने के लिए जाना जाता था। कई दलों के विलय और विघटन से उपजे मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) को चौधरी चरण सिंह के साथ भी काम करने का अनुभव था। धरती पुत्र कहलाने वाले मुलायम सिंह यादव की किसानों, मजदूरों और पिछड़ों में अच्छी पैठ थी। छात्र राजनीति से करियर की शुरुआत करने वाले मुलायम सिंह यादव  शुरुआती दौर में लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में रहे और फिर चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल के साथ भी रहे। यही नहीं इसके बाद भारतीय लोकदल में रहे और फिर समाजवादी जनता पार्टी का हिस्सा रहे। अंत में 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी का गठन किया। नेताजी को राजनीति में अजातशत्रु के तौर पर जाना जाता था। एचडी देवगौड़ा सरकार में रक्षा मंत्री रहे मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के ही दौर में सुखोई फाइटर जेट के लिए रूस से डील फाइनल हुई थी। यही नहीं सीमा पर चीन और पाकिस्तान को जवाब देने में उनका रुख आक्रामक रहा था।

राजनीतिक जीवन की शुरुआत में मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) आर्थिक रूप से सशक्त नहीं थे। पहलवानी और मास्टरी छोडऩे के बाद उन्होंने पूरी तरह से राजनीति में आने का निर्णय लिया था। हालांकि पहले वे पहलवानी के साथ-साथ राजनीतिक अखाड़े में भी सक्रिय रहे लेकिन, एक घटना ने उनका जीवन बदल डाला। यह बात 60 के दशक की है। डॉ. राम मनोहर लोहिया से प्रभावित होकर मुलायम सिंह यादव समेत कई युवा उस वक्त राजनीति में आने लगे थे। मुलायम भी उन्हीं में से एक थे। हालांकि मुलायम का पहला शौक पहलवानी था। वो अक्सर कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते रहते थे। एक बार की बात है जब जसवंत नगर के तत्कालीन विधायक और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता नत्थू सिंह एक प्रतियोगिता में बतौर अतिथि आमंत्रित थे। उसमें मुलायम ने अपने से काफी बड़े पहलवान को चित कर दिया। तालियों की गूंज से पूरा मैदान गूंज रहा था। उस वक्त नत्थू सिंह की नजर 28 साल के मुलायम पर पड़ी और वे उनसे प्रभावित हो गए। नत्थू सिंह ने उन्हें अपने पास बुलाया और इसके बाद मुलायम उनके शागिर्द बन गए। बस फिर उस दिन से मुलायम का राजनीतिक जीवन में नया शुभारंभ हुआ। हालांकि इससे पहले भी मुलायम लोहिया के समर्थन में कई रैलियों में हिस्सा लेते रहते थे लेकिन, विधायक का शार्गिद बनकर अब वे पूरी तरह राजनीति में आ गए। इस बीच मुलायम ने करहल के जैन इंटर कॉलेज में मास्टर की नौकरी भी की।

1967 में मुलायम सिंह (Mulayam Singh) ने जसवंत नगर से चुनाव लड़ा और कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर विधानसभा में प्रवेश लिया। वास्तव में मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) वह राजनीतिक व्यक्तित्व थे, जिन्होंने खुद ही खुद को बनाया। उनके पास दूरदृष्टि थी और वे लोकप्रियता के तमाम पायदान पार कर चुके थे। समाजवादी पार्टी क्षेत्रीय पार्टी है, लेकिन इसका फलक राष्ट्रीय है। ऐसा सिर्फ मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के राजनीतिक कद और उनके सभी राजनीतिक दलों को साथ लेकर चलने से हुआ। समाजवाद अब सिर्फ किताबों में पढऩे का विषय रह गया है, बावजूद इसके मुलायम सिंह यादव हमेशा समाजवाद के पर्याय बने रहेंगे।
                                                  सादर श्रद्धांजलि!